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फेफड़े के रक्षक सेल को बना दिया भक्षक


Agra:
  • महाराष्ट्र में मिले कोरोना के नए डबल म्यूटेंट वेरिएंट का असर
  • प्रतिरोधी सेल ही बढ़ा रहे हैं फेफड़ों में संक्रमण
  • दो दिन के बुखार में हो रहे फेफड़े गंभीर संक्रमित

कोरोना की इस लहर में निशाने पर सीधे लंग्स हैं। दो दिन के बुखार में ही संक्रमण सीधे लंग्स तक पहुंच रहा है। एक्स-रे तथा सीटी कराने पर पता चलता है कि लंग्स में 40 प्रतिशत तक संक्रमण हैं। इसका प्रमुख कारण कोरोना के डबल म्यूटेंट वेरिएंट में बहुत अधिक वायरल लोड होना तो है ही। साथ ही कोरोना का यह वेरिएंट लंग्स के इम्यून सेल जिसे मेक्रोफेजेज कहा जाता है, उसके साथ मिलकर इम्यून सेल को लंग्स के खिलाफ काम करने को मजबूर कर देता है।

स्वीडन के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट में अभी हाल में हुए अध्ययन के अनुसार फेंफड़ों की संरचना ही ऐसी है यह हवा तथा खून में मौजूद बैक्टीरिया या वायरस का शिकार जल्दी होता है। मेक्रोफेजेज वो प्रतिरोधी कोशिकाएं हैं जो लंग्स की ऐसे किसी आक्रमण से रक्षा करती हैं, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में यह प्रतिरोधी सेल लंग्स में सीओपीडी तथा कोविड 19 का संक्रमण कर देते हैं। स्वीडन में हुई इस स्टडी में पता चला है कि लंग्स की रक्षा करने वाले यह सेल सफेद रक्त कणों मोनोसाइट्स से उत्पन्न होते हैं। इसके दो प्रकार हैं। एक क्लासिकल सीडी 14 प्लस मोनोसाइट्स तथा नॉन क्लासिकल सीडी 16 प्लस मोनोसाइट्स।

अध्ययन में जीन एक्टिविटी तथा आरएनए सीक्वेंसिंग के आधार पर देखा गया कि क्लासिकल मोनोसाइट्स हवा के माध्यम से फेफड़ों के टिशू तक पहुंच कर मेक्रोफेजेज में बदल जाते हैं जो लंग्स की बैक्टीरिया या वायरस के हमले से रक्षा करते हैं। कोरोना का वायरस नॉन क्लासिकल मोनोसाइट में प्रवेश कर उसे लंग्स के टिशू तक नहीं पहुंचने देता और यही लंग्स की रक्षा करने वाले यही मेक्रोफेजेज लंग्स में गंभीर सूजन तथा संक्रमण फैला देते हैं। कोविड से ग्रसित मरीजों में पाया गया कि मोनोसाइट्स की संख्या उनमें बहुत कम थी क्योंकि वे खून को छोड़कर सीधे लंग्स में पहुंच गए तथा लंग्स को गंभीर रूप से संक्रमित कर दिया। 

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